हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,लखनऊ। इमाम जाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम की शहादत की याद में दफ़्तर-ए-नुमाइंदगी आयतुल्लाहिल उज़मा सीस्तानी द०ज़ि०, बाब-उन-नजफ सज्जाद बाग कॉलोनी में मजलिस-ए-अज़ा आयोजित की गई।
मजलिसे अज़ा की शुरुआत मौलाना मुहम्मद अली ने तिलावत-ए-कुरआन से की और आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली हुसैनी सीस्तानी द०ज़ि० के प्रतिनिधि (नुमाइंदे), हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद अशरफ अली अल-ग़रवी ने मजलिस को संबोधित किया।
मौलाना सैयद अशरफ अल-ग़रवी ने सूरह तौबा की आयत 119, “ऐ ईमान वालों! अल्लाह से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ,” को अपने भाषण का आधार बनाते हुए कहा कि दोस्ती और संगत का इंसानी ज़िंदगी पर गहरा असर पड़ता है। सच्चे की दोस्ती इंसान को सच्चा बनाती है, जबकि झूठे की दोस्ती इंसान को झूठ की ओर ले जाती है।
मरजा ए आला के प्रतिनिधि ने इमाम जाफर सादिक़ अलैहिस्सलाम की शैक्षिक और नैतिक शिक्षाओं पर रोशनी डालते हुए अब्बासी शासक मंसूर दवानिक़ी के अपराधों और विश्वासघात का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अगर उसके अत्याचार और धोखे न होते, तो हक़ के मानने वालों की संख्या और बढ़ती और लोग सच्चाई से भटकते नहीं।
मौलाना अशरफ अल-ग़रवी ने आगे कहा कि धर्म कभी भी हत्या, खून-खराबा और अत्याचार की अनुमति नहीं देता। धर्म यह इजाज़त नहीं देता कि किसी बेगुनाह का क़त्ल किया जाए या आम नागरिकों के खून से खेला जाए। इसलिए सच्चे धार्मिक नेता हमेशा निर्दोषों के खून बहाने से रोकते हैं।
वर्तमान परिस्थितियों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि जब-जब धार्मिक नेताओं ने बेगुनाहों के खून बहाने से रोका है, तब-तब ज़ालिमों ने उनका विरोध किया है, उन्हें धमकाने और चुप कराने की कोशिश की है, उनका अपमान किया। लेकिन यही धमकियाँ और अपमान अंततः उन ज़ालिमों के पतन का कारण बने हैं।
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